Antim Kshitij – The Final Horizon
Antim Kshitij – A Short Story in Hindi

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Editorial Note
While we usually focus on English literature and academic guides, today we are proud to feature a special creative piece in Hindi by Shikha Pandey, an alumnus of the University Department of English, VBU, Hazaribagh. “अंतिम क्षितिज” (The Final Horizon) is a philosophical dialogue exploring how different generations perceive love, possession, and freedom. Whether you view love as a quiet river or a fierce fire, we hope this beautifully crafted narrative gives you something to reflect upon.
भूमिका
प्रेम—एक ऐसा भाव, जिसकी अनुभूति मनुष्य ने सदियों से की है, पर जिसकी कोई एक निश्चित परिभाषा आज तक नहीं गढ़ सका। समय बदला, समाज बदला और उसके साथ प्रेम को देखने की दृष्टि भी बदलती चली गई।
यह कथा दो मनुष्यों की नहीं, दो पीढ़ियों की दो भिन्न प्रेम-दृष्टियों का संवाद है।
एक ओर वह पीढ़ी है, जिसके लिए प्रेम निष्ठा, स्थायित्व, एकनिष्ठता और आजीवन समर्पण का नाम है—हृदय में किसी को स्थान दे देने के पश्चात् उसे जीवनपर्यंत उसी निष्ठा और सम्मान के साथ निभाना। दूसरी ओर वह दृष्टि है, जो प्रेम में निकटता के साथ-साथ स्वतंत्रता, व्यक्तिगत सत्य और स्वेच्छा को भी उतना ही आवश्यक मानती है—जहाँ प्रेम अधिकार नहीं, बल्कि दूसरे के अस्तित्व और उसकी स्वतंत्र इच्छा को स्वीकार करने का साहस है।
इसी वैचारिक अंतर से कुछ प्रश्न जन्म लेते हैं—
क्या प्रेम का अर्थ किसी को पा लेना है, अथवा उसे उसके सत्य के साथ स्वीकार करना?
क्या प्रेम में अधिकार स्वाभाविक है, अथवा समर्पण ही उसका वास्तविक स्वरूप है?
क्या दूरी प्रेम को क्षीण करती है, अथवा प्रेम निकटता का मोहताज ही नहीं?
क्या प्रेम नियति है, अथवा उसे पाने का साहस?
इन प्रश्नों के उत्तर इस कथा में नहीं दिए गए हैं। क्योंकि यह संवाद किसी एक विचार को सत्य सिद्ध करने के लिए नहीं, बल्कि दो युगों की भिन्न धारणाओं को आमने-सामने रखने के लिए है।
और अंततः उस संवाद के पार शेष रह जाता है—एक प्रश्न, एक मौन और एक दूरस्थ “अंतिम क्षितिज”।
अंतिम क्षितिज
सांझ धीरे-धीरे अपने अंतिम रंग आकाश पर बिखेर रही थी। पश्चिम दिशा में अस्त होते सूर्य की किरणें नदी के शांत जल पर सुनहरी रेखाएँ उकेर रही थीं। मंद समीर वृक्षों की शाखाओं को छूता हुआ ऐसे बह रहा था मानो प्रकृति स्वयं किसी अनकहे संवाद की साक्षी बनने को ठहर गई हो। दूर कहीं मंदिर की घंटियों का स्वर वातावरण में घुल रहा था और उनके बीच पसरा मौन किसी प्राचीन श्लोक की भाँति गंभीर प्रतीत हो रहा था।
नदी के तट पर एक विशाल शिला थी। उसी शिला के दो छोरों पर वे दोनों बैठे थे। उनके मध्य इतनी दूरी थी कि कोई उन्हें अपरिचित समझ ले, परंतु उनके बीच का मौन इतना परिचित था कि उसमें वर्षों की अनकही बातें समाई हुई थीं।
विवेक कई बार उसकी ओर देखता, फिर अपनी दृष्टि झुका लेता। उसके भीतर जैसे अनेक वाक्य जन्म लेते और उसी क्षण दम तोड़ देते। अंततः उसने एक गहरी साँस ली। उसे लगा कि यदि आज भी वह अपने मन का भार शब्दों में न बदल सका तो शायद यह अवसर फिर कभी नहीं मिलेगा।
कुछ क्षणों तक वह नदी के बहते जल को निहारता रहा। फिर बिना उसकी ओर देखे धीमे स्वर में बोला—
विवेक: “क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगा कि मेरे मौन में भी तुम्हारा नाम रहता है?”
सुधा ने क्षणभर उसकी ओर देखा। उसकी दृष्टि में न कठोरता थी, न कोमलता—केवल एक शांत स्थिरता थी। उसने बिना किसी उतावलेपन के उत्तर दिया—
सुधा: “मौन में किसी का नाम होना और हृदय में किसी का स्थान होना, दोनों भिन्न बातें हैं।”
उस उत्तर ने विवेक को निरुत्तर नहीं किया, बल्कि उसके भीतर छिपे आग्रह को और अधिक मुखर कर दिया। उसने अपनी उँगलियों को आपस में भींचते हुए कहा—
विवेक: “फिर भी मुझे विश्वास है कि तुम्हारे लिए जो मेरे हृदय में है, वही प्रेम है।”
सुधा के अधरों पर एक क्षीण मुस्कान उभरी। वह मुस्कान उपहास की नहीं, अनुभव की थी। उसने धीरे से नदी की ओर देखा, मानो अपने शब्द उसी प्रवाह से चुन रही हो।
सुधा: “विश्वास और सत्य का संबंध वैसा नहीं होता जैसा लोग समझते हैं। लगना मन का अनुमान है, और होना सत्य का प्रमाण। तुम्हें जो प्रतीत होता है, वह आवश्यक नहीं कि सत्य भी हो। प्रेम की अनुभूति कैसी होती है, ज्ञात भी है?”
उस प्रश्न में चुनौती नहीं थी, केवल जिज्ञासा थी।
विवेक ने क्षणभर आँखें बंद कर लीं। उसके चेहरे पर जैसे किसी पुरानी स्मृति की छाया उतर आई। उसने बहुत संयत स्वर में उत्तर दिया—
विवेक: “निःसंदेह, मैंने भी किसी से अथाह प्रेम किया था।”
सुधा ने उसकी बात पूरी होने तक प्रतीक्षा की। फिर उसने उसकी ओर देखते हुए उतनी ही शांति से कहा—
सुधा: “अगर आप कह सकते है या कह देते हैं कि आपको किसी से प्रेम था, तो वो कुछ भी था पर प्रेम नहीं था।”
यह वाक्य किसी तीर की तरह नहीं, बल्कि किसी दर्पण की तरह था, जिसमें विवेक स्वयं को देखने को विवश हो गया। कुछ क्षण तक वह मौन रहा। फिर उसने हल्की मुस्कान के साथ सिर उठाया। उसके स्वर में अब तर्क था।
विवेक: “यह काव्यात्मक बातें है, प्रेम कितना ही प्रगाढ़ क्यों ना हो, अगर उसमें दूरी की निरंतरता बनी रहे तो वह फीकी पड़ ही जाती है। जिस प्रेम को आप प्राप्त ना कर सकें, सदैव अपने निकट ना रख सकें तो वह प्रेम सार्थक कैसे हो सकता है? प्रेम को सार्थकता के पायदान तक पहुंचाने के लिए निकटता अतिआवश्यक है। या तो थामो या तो छोड़ दो।”
उसके अंतिम शब्द हवा में देर तक तैरते रहे।
सुधा ने उन शब्दों को जैसे भीतर तक सुना। उसने धीरे-धीरे उसकी ओर दृष्टि उठाई। उसके चेहरे पर आश्चर्य की हल्की रेखा उभरी।
सुधा: “या तो थामो या तो छोड़ दो??? पर प्रेम इन दोनों शब्दों से अधिक गहरा है। कुछ लोग हाथ में नहीं, हृदय में रखे जाते हैं। जहां दूरी भेद नहीं, और पास होना अधिकार नहीं होता। क्योंकि प्रेम किसी को बांधना नहीं, बल्कि उसे इतना सुरक्षित करना है कि वह जाना चाहे तो भी बिना किसी डर के जाए। रुकने की ज़िद नहीं और जाने की अनुमति भी नहीं– प्रेम उस मौन की सहमति है जहां दूसरा अपना सत्य चुन सके। जो प्रेम सच में शाश्वत है वह ना पास होने से बढ़ता है ना दूर जाने से घटता है।”
उसके शब्दों के बाद वातावरण और अधिक शांत हो गया। केवल नदी का स्वर सुनाई दे रहा था, मानो वह भी इस विचार को अपने साथ बहा ले जा रही हो।
विवेक कुछ देर तक उसकी ओर देखता रहा। उसके भीतर अनेक प्रश्न उठ रहे थे। अंततः उसने उनमें से एक को शब्द दे दिए—
विवेक: “और अधिकार??? उसका क्या?”
विवेक का प्रश्न हवा में स्थिर हो गया। मानो उसने केवल एक शब्द नहीं पूछा था, बल्कि उन समस्त धारणाओं का आधार पूछ लिया था जिन पर मनुष्य अपने संबंधों की इमारत खड़ी करता है।
लड़की ने उसकी ओर देखा। उसकी दृष्टि में न प्रतिवाद था, न उपेक्षा। वह ऐसे देख रही थी जैसे किसी बालक ने जीवन का सबसे कठिन प्रश्न पूछ लिया हो और उत्तर देने से पहले उसे शब्दों से अधिक, संवेदना की आवश्यकता हो।
उसने अपने समीप पड़ी एक सूखी पत्ती उठाई। कुछ क्षण उसे उँगलियों के बीच घुमाती रही, फिर उसी सहजता से उसे नदी के प्रवाह में छोड़ दिया। पत्ती बिना किसी प्रतिरोध के जल के साथ बह चली। तब उसने शांत स्वर में कहा–
सुधा: “प्रेम में अधिकार मांगा नहीं जाता, स्वेच्छा से अर्पित किया जाता है। स्वयं पर किसी का सर्वस्व अधिकार मान लेना ही प्रेम की पराकाष्ठा है।”
विवेक ने तुरंत उत्तर नहीं दिया।
विवेक: “मेरा मत इससे बिलकुल विपरीत है। यदि आप किसी से प्रेम करते हैं तो उस पर समस्त अधिकार आपके हो जाते हैं। और अपने अधिकारों के लिए लड़ना कोई अनुचित बात नहीं। यदि मैंने तुम्हें अपना मान लिया है, तो तुम्हे पाने के लिए प्रयत्न करना, तुम्हें अपने अधिकारों के रूप में देखना यह मेरा अधिकार है।”
सुधा ने उसकी बात बिना टोके पूरी सुनी। उसके बाद उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
सुधा: “किसी को अपना मान लेना, उसके तुम्हारा हो जाने का प्रमाण नहीं; और अपने अधिकारों के लिए आवश्यक लड़े, किंतु जिस पर अधिकार नहीं उसका मोह ना करें…”
विवेक कुछ क्षण उसके चेहरे को देखता रहा। उसके लिए यह उत्तर अधूरा था। वह थोड़ा आगे झुका।
विवेक: “तात्पर्य?”
सुधा ने सामने बहती नदी की ओर देखा। उसके अधरों पर वही शांत भाव लौट आया।
सुधा: “तात्पर्य ये श्रीमान, की बड़े से बड़ा पर्वत भी छोटी सी नदी का मोह नहीं रखता, नदी को रोकने का प्रयत्न करने वाले पर्वत को टूटना पड़ता है, नदी पर अधिकार तो केवल समुद्र का ही है।”
उसने जैसे ही वाक्य समाप्त किया, विवेक की दृष्टि नदी से हटकर दूर खड़े पर्वतों पर टिक गई। कुछ क्षण वह मौन रहा। फिर उसके भीतर से एक नया तर्क जन्मा।
विवेक: “आप समुद्र की शक्ति की बात कर रही है, या पर्वत की निर्बलता की।”
सुधा: “मैं नदी की नियति की बात कर रही हूं।”
लगा कि बात अभी समाप्त नहीं हुई है। उसने नदी की ओर देखते हुए कहा—
विवेक: “क्या पता की नदी का समुद्र को अपनी नियति मान लेना उसका भ्रम मात्र हो, किसे ज्ञात है कि उसे कभी यह विकल्प ही ना मिला हो कि वह झरना बनकर पर्वतों की गोद में ठहरना चाहती है या समुद्र में विलीन होकर अस्तित्वहीन होना।”
सुधा ने धीरे-धीरे गहरी साँस ली। उसने नदी के प्रवाह को वैसे ही देखा जैसे कोई साधक अपने आराध्य को देखता है। फिर उसने कहा—
सुधा: “उसे विकल्प की कभी आवश्यकता ही नहीं थी, अगर उसे विकल्प चाहिए होता तो वह इस प्रकार उन्मुक्त, अविरल, निर्बाध, चंचल, कल–कल करती हुई समुद्र की ओर आकृष्ट ना होती, क्योंकि उसे भली-भांति ज्ञात है कि पर्वत के पास उसे संभालने का सामर्थ्य कभी था ही नहीं।”
कुछ क्षणों तक दोनों मौन रहे। नदी का स्वर अब पहले से अधिक स्पष्ट सुनाई दे रहा था। विवेक मुस्कराया। उसने शांत किंतु आत्मविश्वास से भरे स्वर में कहा—
विवेक: “झरना भी समुद्र से किसी भी रूप में कम नहीं है। भले ही वह विस्तार और आकार में समुद्र के समान ना हो, किंतु सुंदरता में तो वह समुद्र से कहीं अधिक मनमोहक है, केवल विशाल होना ही किसी को श्रेष्ठ नहीं बना देता, कई बार छोटी सी धारा भी अपने सौंदर्य और अस्तित्व से विशाल समुद्र को पीछे छोड़ देती है।”
सुधा ने उसकी बात ध्यानपूर्वक सुनी। उसकी आँखों में क्षणभर के लिए प्रशंसा की हल्की झलक आई। उसे यह स्वीकार करने में तनिक संकोच नहीं था कि सामने बैठा व्यक्ति विचारहीन नहीं था। फिर उसने उसी शांति से उत्तर दिया—
सुधा: “प्रकृति किसी को उसके आकार से नहीं, उसके स्वभाव से पहचानती है। प्रत्येक गर्जना समुद्र की नहीं होती, और प्रत्येक प्रकाश सूर्य का नहीं होता।”
सूर्य अब क्षितिज के लगभग पीछे जा चुका था। आकाश में गहराता नीला रंग धीरे-धीरे रात का स्वागत कर रहा था। दोनों के बीच फिर कुछ क्षणों का मौन छा गया। पर यह मौन समाप्ति का नहीं, अगले विचार के जन्म का मौन था। लड़के ने दूर क्षितिज की ओर देखते हुए जैसे स्वयं से कहा—
विवेक: “तुम प्रेम को नदी मानती हो, मैं उसे अग्नि मानता हूँ। नदी अपनी नियति तक पहुँचने के लिए बहती है, पर अग्नि अपनी दिशा स्वयं बना लेती है। यदि प्रेम केवल नियति होता, तो उसके लिए साहस की आवश्यकता ही न पड़ती।”
विवेक के अंतिम शब्दों के साथ ही वातावरण में एक विचित्र गंभीरता उतर आई। उसने नदी से दृष्टि हटाकर सुधा की ओर देखा। उसके चेहरे पर अपने विचारों के प्रति दृढ़ विश्वास था। वह चाहता था कि उसके तर्कों को केवल सुना ही नहीं जाए, समझा भी जाए।
सुधा कुछ क्षण मौन रही। उसकी आँखें बहती हुई नदी पर टिकी थीं, मानो वह अपने उत्तर को शब्दों में नहीं, प्रकृति में खोज रही हो। हवा का एक मंद झोंका आया और उसके खुले केशों की कुछ लटें उसके मुख पर आ ठहरीं। उसने उन्हें धीरे से कानों के पीछे सरकाया और फिर उसी शांत स्वर में बोली—
सुधा: “प्रेम को अग्नि मानने और नदी मानने का यही भेद हमारे विचारों का भी भेद है, श्रीमान। नदी का धर्म प्रवाहित होना है और अग्नि का धर्म प्रज्वलित होना। दोनों अपने-अपने धर्म में पूर्ण हैं, किंतु उनका संगम असंभव है। क्योंकि जहाँ अग्नि नदी से मिलती है, वहाँ या तो अग्नि बुझ जाती है अथवा नदी वाष्प बनकर अपना स्वरूप खो बैठती है। संगम वहीं संभव है जहाँ स्वभावों में साम्य हो, जहाँ एक के अस्तित्व की रक्षा के लिए दूसरे का अस्तित्व विलीन न करना पड़े।”
उसके शब्दों के साथ जैसे संध्या का अंतिम प्रकाश भी क्षितिज में विलीन हो गया।
विवेक ने क्षणभर तक कोई उत्तर नहीं दिया। वह उन वाक्यों को मन ही मन दोहराता रहा। उसे लगा कि उसके सामने बैठी यह युवती केवल तर्क नहीं कर रही, बल्कि अपने जीवन-दर्शन को शब्द दे रही है। किन्तु उसका स्वभाव हार मानने वाला नहीं था। उसने आकाश की ओर देखा। अब वहाँ एक हल्की चाँदी-सी आभा उभरने लगी थी। उसने मुस्कराकर कहा—
विवेक: “परंतु मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है कि वह असंभव को प्राप्त करने की इच्छा रखता है। लोग तो अपनी प्रार्थनाओं में चंद्रमा तक मांग लेते हैं।”
सुधा ने भी उसी दिशा में दृष्टि उठाई। आकाश में चंद्रमा अभी पूर्ण रूप से प्रकट नहीं हुआ था, किन्तु उसका उजास वातावरण में फैलने लगा था। उसके अधरों पर एक क्षीण मुस्कान आई।
सुधा: “चंद्रमा मांगने वालों को यह अनुमान नहीं होता कि यदि उनकी प्रार्थना स्वीकार हो जाए तो हथेलियां जल जाएगी।”
विवेक मुस्कुराया। उसने सहज स्वर में कहा—
विवेक: “और कौन जाने की प्रार्थनाओं में मांगा हुआ चंद्रमा शीतल ही हो।”
सुधा ने बिना मुस्कराहट खोए उत्तर दिया—
सुधा: “चंद्रमा अगर शीतल भी हुआ तो हम उसे रखेंगे कहां? हमारे अधिकार में आकाश थोड़ी है।”
उसके शब्दों में गहरी सादगी थी। मानो वह केवल चंद्रमा की नहीं, प्रत्येक उस वस्तु की बात कर रही थी जिसे मनुष्य अपनी इच्छा से अपना बना लेना चाहता है। विवेक ने हल्के व्यंग्य और अपनत्व के मिश्रित भाव से कहा—
विवेक: “वैसे चंद्रमा को रखने के लिए पृथ्वी भी बुरी नहीं है।”
सुधा ने सिर हिलाया। उसकी आँखों में क्षणभर के लिए गंभीरता लौट आई।
सुधा: “और फिर केवल अपने हठ को पूर्ण करने के लिए आकाश के झूमर को पृथ्वी पर उतर जाए और धूल में मिला दिया जाए।”
यह सुनकर विवेक कुछ क्षण मौन रहा। उसने धीमे स्वर में कहा—
विवेक: “जब प्रेम होता है तब चंद्रमा के लिए आकाश और पृथ्वी में कोई भेद नहीं रह जाता, प्रेम के समक्ष स्थान और सीमाएं अपना अर्थ खो देती है। प्रेम एक ऐसी मनमोहक अनुभूति है कि आप इसे जितनी बार भी अनुभव करते हैं यह आपको हर बार भिन्न अनुभव देती है।”
सुधा ने उसकी आँखों में देखा। उसने अनुभव किया कि सामने बैठा व्यक्ति अपने कथन पर विश्वास करता है। पर उसके अपने विश्वास, उससे भिन्न थे। उसने अत्यंत संयत स्वर में कहा—
सुधा: “प्रेम बदलते ऋतुओं के समान नहीं होता। इस युग में, जहां लोग संबंधों को वस्त्रों की भांति बदलने लगे हैं, मैं उस प्रेम की तलाश में हूं जो कुल्हड़ की चाय के समान हो, जो एक बार अधरों का स्पर्श पाकर हृदय में अपनी सुगंध छोड़ दे, और फिर उसी मिट्टी में विलीन हो जाए जिससे उसका अस्तित्व बना था। प्रेम वह नहीं जो प्रत्येक नवीन आकर्षण के साथ अपना रूप बदल ले, वह तो एक ऐसा संकल्प है जिसे हृदय एक बार स्वीकारता है फिर जीवनपर्यंत उसका सम्मान करता है। जो भाव, समय, परिस्थिति और आकर्षण के साथ बदल जाए उसे प्रेम कहना प्रेम की पवित्रता का अपमान है।”
उसके शब्द समाप्त हुए तो दोनों के बीच फिर मौन उतर आया। किन्तु इस बार वह मौन विवाद का नहीं, विचार का था। दोनों अपने-अपने सत्य के साथ बैठे थे। न कोई किसी को पराजित कर पाया था, न कोई स्वयं पराजित हुआ था। केवल दो दृष्टिकोण, एक ही नदी के दो किनारों की भाँति, समानांतर चल रहे थे।
उसी मौन को भंग करते हुए विवेक ने गहरी साँस ली। फिर उसने शांत स्वर में कहा—
विवेक: “यदि प्रेम केवल एक बार ही संभव होता, तो विधाता मनुष्य को पुनः मुस्कुराने का सामर्थ्य ही क्यों देता? क्या प्रत्येक सूर्यास्त के बाद अगला सूर्योदय असत्य हो जाता है? यह आवश्यक तो नहीं की जो तुम्हें प्रेम का अर्थ समझाइए वह तुम्हारे हिस्से ही आए।”
युवक का प्रश्न सुनकर सुधा कुछ क्षण शांत रही। उसने क्षितिज की ओर देखा, जहाँ अँधेरा धीरे-धीरे प्रकाश को अपने भीतर समेट रहा था। उसके चेहरे पर वही स्थिरता थी, मानो उसके उत्तर किसी तर्क से नहीं, किसी गहरे विश्वास से जन्म लेते हों।
सुधा: “क्योंकि पहली वर्षा के बाद मिट्टी अपनी पहली सुगंध फिर कभी नहीं देती। और अगर आपने एक बार पूर्ण हृदय से प्रेम कर लिया है तो दूसरी बार अर्पित करने के लिए आपके पास शेष ही क्या रह जाता है।”
विवेक ने उसकी बात ध्यान से सुनी। वह कुछ पल तक मुस्कुराता रहा, जैसे इस उत्तर की अपेक्षा उसे पहले से थी। उसने शांत स्वर में कहा—
विवेक: “किंतु जीवनपर्यंत केवल एक व्यक्ति पर स्थिर रह पाना… ऊबना तय है… यही मनुष्य की प्रवृत्ति है।”
सुधा के चेहरे पर हल्की मुस्कान उभरी।
सुधा: “क्या आपने कभी चूल्हे को अग्नि से ऊबते देखा है?? अग्नि को धुएं से?? दीपक को अपनी लौ से?? अथवा वृक्ष को अपनी जड़ों से??? मनुष्य अपनी दुर्बलताओं को प्रकृति का नाम देकर उन्हें उचित सिद्ध नहीं कर सकता। और ऊब जाना किसे कहते हैं?? ऊबना प्रेम का स्वभाव नहीं, अस्थिर मन का दोष है। वह मन की मात्र चंचलता है जिसका मूल्य अंततः आपका बहुमूल्य चरित्र चुकता है”
उसके शब्दों के बाद कुछ क्षण तक केवल नदी का स्वर सुनाई देता रहा। विवेक ने पहली बार कोई प्रतिवाद नहीं किया। उसने गहरी साँस ली और मुस्कराकर उसकी ओर देखा।
विवेक: “तुम्हारे तर्कों ने मेरे विचारों को विचलित अवश्य किया है, पर विश्वास अभी भी शेष है। एक दिन तुम्हारे हृदय के उस रिक्त स्थान में मेरा अंश अवश्य होगा।”
सुधा की आँखों में क्षणभर के लिए गंभीरता उतर आई। उसने बहुत संयत स्वर में उत्तर दिया—
सुधा: “रिक्त स्थान प्रत्येक व्यक्ति के लिए नहीं छोड़े जाते, श्रीमान। कुछ स्थान केवल नियति के लिए सुरक्षित होते हैं। मेरे हृदय का वह स्थान किसी प्रतीक्षा में नहीं है, वह केवल मेरे अर्धांग के लिए सुरक्षित है। यदि नियति उसे किसी के नाम न करे, तो वह जीवनपर्यंत रिक्त ही रहेगा। और रिक्त रह जाना, अनुचित व्यक्ति से भर जाने से कहीं अधिक श्रेष्ठ है। क्योंकि रिक्तता अपवित्र नहीं होती, पर अनुचित अधिकार अवश्य होता है”
उसके शब्दों के साथ ही दोनों फिर मौन हो गए। इस बार वह मौन किसी उत्तर की प्रतीक्षा नहीं कर रहा था। दोनों अपने-अपने विचारों पर अडिग थे, पर एक-दूसरे के विचारों के प्रति सम्मान भी उतना ही था।
नदी अपने स्वभाव के अनुसार बहती रही। आकाश में चंद्रमा निस्पृह भाव से चमकता रहा। और उनके बीच छिड़ा यह संवाद किसी निष्कर्ष पर पहुँचकर समाप्त नहीं हुआ, बल्कि दो विचारधाराओं की तरह समय के प्रवाह में आगे बढ़ गया—जहाँ निर्णय पाठक पर छोड़ दिया गया कि प्रेम नदी है या अग्नि, अधिकार है या समर्पण, नियति है या साहस।
स्वरचित
SHIKHA PANDEY 🪻✨
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